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Written by Administrator
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Monday, 18 January 2010 11:55 |
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गोपाल शर्मा.... भारत के सबसे कद्दावर कम्युनिस्ट नेता थे ज्योति बसु! उनके बाद शायद ही भारत में कोई कम्युनिस्ट नेता पैदा हो जिसका प्रधानमंत्री बनना लगभग सुनिश्चित हो जाए ..जो 23 साल तक लगातार मुख्यमंत्री रहने के बाद अपनी ही पार्टी के नेता के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़े ..जो उपमुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष रहा हो.. जिसका दिल्ली आना घटना हो.. 40 सालों तक पार्टी की केन्द्रीय भूमिका में महत्वपूर्ण स्थान हो और प्रादेशिक क्षत्रप होते हुए भी राष्ट्रीय स्तर पर वरिष्ठता एवं सम्मान प्राप्त हो। ..निश्चय ही, भारत के लिए वे पं. जवाहरलाल नेहरू-इंदिरा गांधी और अटलबिहारी वाजपेयी के श्रेणी के नेता नहीं थे और न उन कम्युनिस्ट नेताओं से अलग थे, जिनको निर्णायक क्षणों में हमेशा गलती करते हुए पाया गया है ..और,
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Last Updated on Wednesday, 03 February 2010 07:58 |
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Written by Administrator
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Friday, 18 December 2009 21:05 |
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आखिर लालकृष्ण आडवाणी की विदाई बेला आ ही गई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद वे खाली कर रहे हैं। उनका स्थान सुषमा स्वराज लेंगी। उधर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर राजनाथ सिंह की जगह महाराष्ट्र के दिग्गज नेता नितिन गडकरी की ताजपोशी होना तय है। आडवाणीजी का सम्मान रखने के लिए उन्हें संसदीय दल का अध्यक्ष बनाया जावेगा। इस नए पद के सृजन हेतु संसदीय बोर्ड संविधान में संशोधन करने जा रहा है। इस प्रकार लालकृष्ण आडवाणी एक तरह से रिटायरमेंट की ओर धकेल दिए गए हैं। यदि यही निर्णय वे लोकसभा चुनाव में मिली पराजय के फौरन बाद ले लेते तो उनका सम्मान और बढ़ जाता। उन जैसे बड़े कद के नेता के लिए लालबत्ती कोई मायने नहीं रखती।
जिस व्यक्ति ने लगभग 15 वर्ष तक देश की राजनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया हो उसके लिए नेता प्रतिपक्ष जैसा पद महत्वहीन है।
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