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Thursday, 31 December 2009 19:10 |
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यह घटना उस समय की है, जब सरदार वल्लभ भाई पटेल छठी कक्षा में पढ़ते थे। उनके एक अध्यापक बच्चों को जरा-जरा सी बात पर छड़ी से मारते थे। कुछ बच्चों और शिक्षकों ने भी उन्हें इस बात के लिए टोका लेकिन अध्यापक महोदय पर कोई असर नहीं पड़ा। उनका रवैया बरकरार रहा। एक दिन उन्होंने एक निर्दोष बच्चे को बेवजह दंड दे दिया। उसकी छड़ी से खूब पिटाई की और उसे कक्षा से बाहर निकाल दिया। सभी बच्चे उस निर्दोष बच्चे की यह हालत देखकर सहम गए। वल्लभ भाई से अपने उस सहपाठी की ऐसी दयनीय दशा देखी नहीं गई। आधी छुट्टी के समय वल्लभ भाई ने सभी विद्यार्थियों को इक_ा किया और उस विद्यार्थी व अध्यापक के बारे में सारी बातें बताईं। सभी विद्यार्थी यह अन्याय होते देखकर एकजुट हो गए और उन्होंने प्रण कर लिया कि जब तक अध्यापक अपनी गलती नहीं मानेंगे तब तक कोई भी विद्यार्थी स्कूल में नहीं पढ़ेगा।
धीरे-धीरे यह बात स्कूल की संचालन समिति तक जा पहुंची। सभी अध्यापकों, प्रधानाचार्य और समिति के सदस्यों ने पुरजोर कोशिश की कि बच्चे फिर से स्कूल में आ जाएं किंतु बच्चे टस से मस नहीं हुए और उन्होंने कहा कि जब तक अध्यापक इस बात का प्रण नहीं लेंगे कि बेवजह किसी छात्र को नहीं पीटा जाएगा तब तक वे स्कूल में नहीं आएंगे। कुछ शिक्षकों और अभिभावकों ने वल्लभ भाई के इस निर्णय को अनुशासनहीनता करार दिया मगर उन्होंने साफ कह दिया कि वे किसी गलत उद्देश्य से ऐसा नहीं कर रहे हैं। चूंकि उनकी भावना पवित्र है, इसलिए इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। आखिरकार प्रधानाचार्य ने सभी विद्यार्थियों का नेतृत्व करने वाले वल्लभ भाई को बुलाया और यह समझौता किया कि आगे से कभी भी बच्चों को बेवजह दंडित नहीं किया जाएगा। तब वल्लभ भाई ने हड़ताल समाप्त की और सभी विद्यार्थी स्कूल में पढऩे के लिए गए। वल्लभ भाई में नेतृत्व का यह गुण बाद में और मजबूत हुआ। |